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संवेदनशील मुख्यमंत्री  अशोक गहलोत के नाम खुला पत्र

केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवानों को भी मिले गेलेन्ट्री अवार्ड का लाभ

आदरणीय अशोक जी, 
 सादर प्रणाम 

  भभक के 1 जनवरी के अंक में फसल बीमा योजना में हो रहे भष्ट्राचार से सम्बंधित  समाचार प्रकाशित किया गया था। मुझे यह सन्तोष है कि 1 जनवरी का भभक का अंक आप तक पहुंच गया और आपने पढ़ने के बाद मुझे पत्र मिल जाने की सूचना भी भिजवा दी। महत्वपूर्ण डाक आप तक पहुंच रही है, इससे यह प्रतीत होता है कि मुख्यमंत्री सचिवालय के अधिकारी भी आपकी तरह संवेदनशील बनने की कोशिश कर रहे हैं। यह खुला पत्र आपको आपकी संवेदनशीलता के कारण ही लिख रहा हूं और यह उम्मीद करता हूं कि केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवानों की इस समस्या का समाधान आप अवश्य करेंगे।
 आपको पता ही है कि राष्ट्रपति की ओर से सेना, पुलिस, केन्द्रीय सुरक्षा बल आदि के जवानों को बहादुरी के लिए प्रतिवर्ष गेलेन्ट्री अवार्ड दिया जाता है। चूंकि यह गेलेन्ट्री अवार्ड कई दौर की जांच से गुजरने के बाद जान जोखिम में डालने वाले जवान को मिलता है इसीलिए अनेक राज्य सरकारों ने अपने प्रदेश के गेलेन्ट्री अवार्ड जवानों को नगद राशि और जमीन आंवटित करने की घोषणा कर रखी है। राज्य सरकार यह सुविधा उन्हीं जवानों को देती है जो राजस्थान के मूल निवासी है। मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि गेलेन्ट्री अवार्ड प्राप्त करने वाले उन जवानों को राजस्थान में राज्य सरकार की सुविधायें नहीं मिल रही जो केन्द्रीय सुरक्षा बलों के अन्तर्गत काम करते हैं। आपको पता ही होगा कि केन्द्रीय सुरक्षा बलों के अन्तर्गत सेन्ट्रल पेरा मिलिट्री फोर्स, बार्डर सिक्यूरिटी फोर्स, सेन्ट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स, इण्डो तिब्बत बार्डर पुलिस, सेन्ट्रल इण्डस्ट्रीयल सिक्यूरिटी फोर्स, सशस्त्र सीमा बल, असम राइफल और नेशनल सिक्यूरिटी गार्ड आते हैं। कायदे से इन बलों के जिन जवानों को गेलेन्ट्री अवार्ड मिलता है, उन्हें राजस्थान सरकार की ओर से निधाüरित राशि और जमीन का आंवटन होना चाहिए, लेकिन इसे नौकरशाही की निर्दयता ही कहा जायेगा कि प्रदेश में केन्द्रीय बलों के जवानों को यह सुविधा नहीं मिल रही। सवाल उठता है कि जब सेना और पुलिस के जवानों को गेलेन्ट्री अवार्ड की सुविधायें राज्य सरकार दे देती हो तो फिर केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवानों को क्यों नहीं मिलती?
 मैं आपको यह भी बताना चाहता हूं कि जब केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवानों ने अपने इस अधिकार के लिए आवाज उठायी तो 19 नवम्बर 2009 को राज्य सरकार के राजस्व विभाग ने एक नोटिफिकेशन जारी कर गेलेन्ट्री अवार्ड की सुविधा केन्द्रीय सुरक्षा बल के जवानों  को  देने के आदेश जारी कर दिए। राजस्व विभाग का यह आदेश आधा-अधूरा है क्योंकि इस आदेश से उन्हीं जवानों को लाभ मिलेगा जिन्हें 19 नवम्बर 2009 के बाद गेलेन्ट्री अवार्ड मिला है। आपको पता ही है कि 1971 के भारत-पाक युद्ध से लेकर आज तक राजस्थान की वीर भूमि के जवानों ने अपनी जान जोखिम में डालकर देश की रक्षा की है। कई जवान तो शहीद भी हो गए। चूंकि आप एक संवेदनशील मुक्यमंत्री हैं इसलिए मैं आपसे यह पूछना चाहता हूं कि 19 नवम्बर 2009 से पूर्व केन्द्रीय सुरक्षा बल के जिन जवानों ने गेलेन्ट्री अवार्ड प्राप्त किया, उन्हें राज्य सरकार की सुविधा क्यों  न मिले? देखा जाए तो यह सरकारों की संवदेनहीनता ही रही कि अब तक केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवानों को उनका हक नहीं मिला। होना तो यह चाहिए कि उन अधिकारियों के खिलाफ  सखत  कार्यवाही हो, जिनकी वजह से देश की सुरक्षा में लगे जवानों को हक नहीं मिला। मेरा मानना है कि जो जवान अपनी जान की परवाह किए बगैर देश के दुश्मनों, आतंकवादियों, नक्सलियों आदि से लड़ता है, उसे कोई सरकार यदि कुछ राशि और जमीन देती है तो अहसान नहीं करती। आप बतायें  कि कितने लोग अपनी मर्जी से मौत के मुंह में जाने को तैयार होते हैं ? पिछले दिनों मेरी मुलाकात अजमेर स्थित केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल गु्रप वन के डीआईजी भगवान सिंह राठौड़ से हुई। तभी राठौड़ ने मुझे यह बताया कि राज्य सरकार हमारे साथ कितना अन्याय कर रही है। पूरी पीड़ादायक दास्तान सुनने के बाद मेरा यही भरोसा था कि यह गम्भीर और महत्वपूर्ण मुद्दा राजस्थान के संवेदनशील मुख्यमंत्री  अशोक गहलोत के समक्ष नहीं रखा गया। यदि यह मुद्दा आपके समक्ष आ गया होता तो राजस्व विभाग की नौकरशाही 19 नवम्बर 2009 का आधा-अधूरा आदेश जारी नहीं कर पाती। मैं आपको यह भी बताना चाहता हूं कि डीआईजी राठौड़ राजस्थान की वीर भूमि के ही जवान हैं और उन्हें गेलेन्ट्री अवार्ड पूर्व में इसलिए नवाजा गया कि उन्होंने छत्तीसगढ़ में नक्सलियों से मुकाबला किया था। इस मुकाबले के दौरान नक्सलियों ने जो विस्फोट किया, उससे राठौड़ के काम के परदे खराब हो गए। आज भी राठौड़ कान की पीड़ा को सहन कर रहे हैं। यह पीड़ा तो एक जवान की है, लेकिन प्रदेश में ऐसे अनेक जवान हैं, जो ऐसी पीड़ाओं को सहन कर रहे है। मैं इस खुले पत्र के माध्यम से आपके समक्ष केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवानों की यह समस्या रख रहा हूं। मुझे उमीद है कि आप नौकरशाही की अड़गेबाजी को हटाते हुए जवानों को गेलेन्ट्री अवार्ड की सुविधा तत्काल प्रभाव से दिलवायेंगे। यदि आप ऐसा करते है तो प्रदेश में आपकी संवेदनशीलता बरकरार रहेगी।
 आपकी संवेदनशीलता हमेशा बरकरार रहे, ऐसी मेरी ईश्वर से प्रार्थना है।

प्रतिष्ठा में,                                                                                         आपका
अशोक जी गहलोत                                                                         एस.पी.मित्तल
मुयमन्त्री- राजस्थान सरकार जयपुर                                           editor@bhabhak.com

 

ऐसे मिला राठौड़ को राष्ट्रपति का गेलेन्ट्री अवार्ड
 अजमेर स्थित केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल यानि सीआरपीएफ के ग्रुप वन के डीआईजी भगवान सिंह राठौड़ को वर्ष 2005 में राष्ट्रपति ने जो गेलेन्ट्री अवार्ड दिया उसके पीछे राठौड़ के संघर्ष की लम्बी कहानी है। 19 अप्रैल 2004 को जब छत्तीसगढ़ के बीजापुर क्षेत्र में राठौड़ सीआरपीएफ की टुकड़ी के साथ पेट्रोलिंग कर रहे थे तभी अचानक करीब 150 नक्सलियों ने हमला कर दिया। राठौड़ की टुकड़ी में मात्र 25 जवान थे, जबकि 150 नक्सलियों ने इस टुकड़ी को चारों तरफ से घेर लिया। नक्सलियों ने जो विस्फोट किया उससे राठौड़ और कई जवान घायल भी हो गए, लेकिन इसके बावजूद भी राठौड़ ने न केवल नक्सलियों से सीधा मुकाबला किया बल्कि अपने जवानों की हौसला अफजाई भी की। राठौड़ ने जख्मी  हालात में ही राइफल से 40 राउण्ड फायर किए। राठौड़ को  फायरिंग करते देख जवानों में भी उत्साह बढ़ गया। जिस समय राठौड़ मुकाबला कर रहे थे तब नक्सलियों से उनकी दूरी मुश्किल से 10 मीटर रही। यदि राठौड़ से जरा सी भी चूक हो जाती तो नक्सली उन्हें मार डालते। राठौड़ को भी यह पता था कि नक्सलियों ने योजनाबद्ध तरीके से हमला किया है ताकि बीजापुर क्षेत्र में मतदाता मतदान न कर सके। नक्सलियों ने मतदान के बहिष्कार का  ऐलान कर रखा था, लेकिन राठौड़ के नेतृत्व ने सीआरपीएफ के चन्द जवानों ने अपनी जान जोखिम में डाल कर जो हिम्मत दिखायी, उससे नक्सलियों को भागना पड़ा। इस संघर्ष के बाद मतदाताओं ने निडर होकर मतदान में भाग लिया। बाद में मौके पर पुलिस भी आ गई। पुलिस ने मामला भी दर्ज किया। इस संघर्ष की जानकारी राज्य सरकार ने सीआरपीएफ के उच्च अधिकारियों को प्रेषित की। इसी आधार पर राठौड़ को गेलेन्ट्री अवार्ड के लिए चयनित किया गया। इस घटना को 6 वर्ष हो गए, लेकिन आज भी राठौड़ कान की पीड़ा को सहन कर रहे है। नक्सलियों ने जो विस्फोट किया उससे लोहे के छरे राठौड़ के कान में और हाथ में घुस गए। हाथ के छरो को तो निकाल लिया गया, लेकिन कान में घुसे छरो ने परदों को बुरी तरह खराब कर दिया। डाक्टरों की लाख कोशिश के बाद भी राठौड़ के कान के परदे आज तक ठीक नहीं हो पाये है। लेकिन राठौड़ को इस बात पर गर्व है कि उन्होंने बीजापुर के जंगलों में जो वीरता दिखायी उससे देश के लोकतन्त्र की रक्षा हुई। लेकिन इसके साथ ही यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजस्थान सरकार ऐसे बहादुर अधिकारी के साथ भेदभाव कर रही है। जवानों की बहादुरी पर राज करने वाले नेताओं को यह समझना चाहिए कि जो सुविधायें   निर्धारित  है वे जवानों को मिलती रहे। यदि भेदभाव होता है तो भविष्य में जवानों के उत्साह में कमी हो सकती है।