आदरणीय गुलाब जी,
सादर प्रणाम
भभक का यह खुला पत्र आपको दूसरी बार लिखा जा रहा है। पूर्व में
बाबू सा यानि आपके पिता कपूüरचन्द कुलिश जी के निधन पर भी एक पत्र
लिखा था। आपका जवाब भी मिला। यह पत्र आपकी उस हिम्मत के लिए लिख
रहा हूं, जिसमें आपने आम जनता से भ्रष्ट मीडिया को उखाड़ फेंकने की
अपील की है। राजस्थान पत्रिका की ओर से आयोजित पण्डित झाबरमल शर्मा
स्मृति वयाख्यान के अन्तर्गत आपने पत्रिका समूह के प्रधान सपादक
की हैसियत से जो भाषण दिया, उसे ज्यो का त्यों 10 जनवरी के
रविवारीय परिशिष्ट में भी प्रकाशित किया गया। आपका यह भाषण मैंने
पूरा पढ़ा। इसमें कोई दो राय नहीं कि आप और राजस्थान पत्रिका समूह
अपनी पीठ थपथपा सकता है। राजस्थान पत्रिका समूह का नाम भ्रष्ट
मीडिया की उस सूची में नहीं है, जिसमें चुनाव के दौरान पैसे लेकर
खबरें छापी गई। मुझे आपके भाषण से ही यह पता चला कि राजनीतिक दलों
के नेताओं के हवाले से पैसे लेकर खबरें छापने वाले अखबारों के नाम
उजागर किए गए हैं। आपकी तरह मैं भी किसी प्रतिद्वन्दी अखबार के नाम
का उल्लेख नहीं कर रहा, लेकिन राजस्थान और मध्यप्रदेश की जनता यह
जानती है कि राजस्थान पत्रिका का प्रतिद्वन्दी अखबार कौनसा है।
मुझे यह भी नहीं पता कि भ्रष्ट मीडिया वाली सूची में आपके
प्रतिद्वन्दी अखबार का नाम है या नहीं, लेकिन मैं इस मौके पर आपकी
हिम्मत को दाद देना चाहता हूं। राजस्थान पत्रिका भी वर्तमान दौर
में देश के चुनिन्दा अखबारों में से एक है। राजस्थान पत्रिका की
प्रिंट मीडिया में अपनी अलग पहचान है। ऐसे में यदि पत्रिका समूह का
प्रधान सम्पादक भ्रष्ट मीडिया को उखाड़ फेंकने का आव्हान करता है तो
यह मीडिया की छवि में एक सुधार ही है। यह भी सही है कि चुनाव के
अवसर पर अधिक सकूüलेशन वाले अखबारों को ही राजनीतिक दल और उनके
नेता पैसे का ऑ र करते हैं। हो सकता है कि गत लोकसभा चुनाव के
दौरान राजस्थान पत्रिका को भी ऐसा ऑफर मिला और आपने ठुकराया दिया।
निज्सन्देह ऐसा कर आपने ईमानदार पत्रकारिता की मशाल को जलाए रखा।
आप अच्छी तरह जानते हैं कि अखबारों में कीमत को लेकर जो होड़ मची
हुई है, उससे अखबार को चलाने के लिए सभी को अनेक जतन करने पड़ रहे
हैं । अखबार प्रकाशन के साथ-साथ मेले, प्रदर्शनी,कोचिंग संस्थान,
सरकारी शिविर, स्वास्थ्य केन्द्र आदि के आयोजन भी किए जा रहे हैं।
इतना ही नहीं हर पाठक को ईनाम मिले, इसके लिए भी लालच दिया जा रहा
है। यानि कोई भी अखबार समूह अखबार छापने के अतिरिक्त बहुत से काम
कर रहा है। एक ओर कागज, श्रम और अन्य संसाधन महंगे हो गए हैं तो
दूसरी ओर बीस पृष्ठ का रंगीन अखबार मात्र डेढ़-दो रूपये में बेचा जा
रहा है। इसमें भी हॉकर का पैन्तीस प्रतिशत कमीशन शामिल है। जाहिर
है कि अखबार पर अंकित कीमत से कहीं ज्यादा खर्चा होता है। ऐसे में
यदि पत्रिका समूह चुनाव की खबरें पैसे लेकर नहीं छाप रहा है तो
अखबारी दुनिया में चमत्कार ही है। जो मालिक अपने अखबार के सकूüलेशन
को अधिक से अधिक बढ़ा रहे हैं उन्हें अखबार का प्रकाशन व्यवसायिक
दृष्टिकोण से ही करना पड़ता है। यदि कोई मालिक सिर्फ पत्रकारिता कर
अखबार का प्रकाशन करेगा तो उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना
पड़ेगा। हो सकता है कि ऐसे में अखबार भी बन्द हो जाये। आपने अपने
भाषण में कहा कि आम जनता भ्रष्ट मीडिया को उखाड़ फेंके। अच्छा हो कि
अगले किसी भाषण में यह भी बताएं कि भ्रष्ट मीडिया को किस प्रकार से
उखाड़ा जा सकता है? जहां तक जनता का सावल है तो यही जनता कैसे- कैसे
राजनेताओं को सत्ता सौप देती है, यह आपको भी पता है। इसमें कोई दो
राय नहीं कि चुनाव के अवसर पर आप भी अग्र लेख लिखकर जनता को जागरूक
करने का काम करते हैं, लेकिन जो परिणाम सामने आते हैं, उससे आप
भलीभान्ति परिचित हैं। भभक तो बहुत छोटा सा अखबार है, लेकिन आपने
भ्रष्ट मीडिया का जो मुद्दा उठाया है, उसमें भभक भी स्वयं को शामिल
करता है। मीडिया के वे चेहरे बेनकाब होने ही चाहिएं जो पैसे लेकर
चुनाव की खबरें प्रकाशित करते हैं। हालांकि भभक इस दौड़ में शामिल
नहीं है, क्योंकि पैसे का ऑफर बड़े अखबार समूह को ही मिलता है।
मैं एक बार पुनज् आपकी हिम्मत को दाद देते हुए यह उम्मीद करता हूं
कि आपने भ्रष्ट मीडिया को उखाड़ फेंकने का जो अभियान चलाया है, उसे
आगे भी चलाते रहेंगे। आप अपने परिवार और पत्रिका समूह के साथियों
के साथ स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें, ऐसी मेरी ईEर से प्रार्थना है।