ऐसे धर्मगुरूओं
से बचें
एस.पी. मित्तल
आसाराम बाबू, किरीट भाई, जैसे कथावाचकों पर समय-समय पर आरोप लगते
रहे हैं, लेकिन सम्भवतज् यह पहला अवसर है, जब किसी धर्मगुरू पर
सैक्स रैकेट चलाने का आरोप लगा है। यह आरोप ही नहीं बल्कि स्वामी
भीमानन्द महाराज उर्फ शिवमूरत नामक एक बदमाश को अनेक लड़कियों के
साथ गिरफतार भी किया गया है। पुलिस ने अब तक जो सबूत जुटाये हैं,
उससे पता चलता है कि भीमानन्द दिल्ली, लखनऊ, मुम्बई, बंगलौर आदि
महानगरों में सैक्स रैकेट संचालित कर रहा था। भीमानन्द ने अपने
भजनों की जो सीडी जारी कर रखी है, उस पर जो टेलीफोन नंबर अंकित कर
रखे हैं, वे लड़कियों के ही हैं। भीमानन्द के बड़े शहरों में जो
आश्रम संचालित हैं, उनमें बड़े-बड़े नेता, अधिकारी, उद्योगपति,
व्यापारी, आदि आते-जाते हैं। भीमानन्द ने थोड़े ही समय में देश भर
में जायदाद का बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया। भीमानन्द के पास से जो
डायरी मिली है, उसमें देश के अनेक वीवीआईपी के नाम दर्ज हैं। देश
में भीमानन्द जैसे बदमाशों का मिलना आम बात है, लेकिन कोई बदमाश
धर्मगुरू बनकर आम लोगों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ कर रहा है,
ऐसा पहली बार हुआ है। असल में भारत में तेजी से धर्मगुरूओं की
संख्या बढ़ रही है, और इसके पीछे मुख्य कारण महिलाओं की धार्मिक
भावनाओं का होना है। समाज में तेजी से फैल रही बुराइयों के कारण
सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं को झेलनी पड़ती है। कोई महिला अपने पति
के शराब पीने, इधर-उधर जाने, बच्चों के बिगड़ने या पढ़ाई न करने के
कारण परेशान है तो कुछ महिलाएं आर्थिक परेशानी से भी दुखी है। ऐसी
दुखी महिलाओं का फायदा ही भीमानन्द जैसे धर्मगुरू उठाते हैं।
परेशान महिलाओं को प्रवचन देकर भीमानन्द समाज में अपनी छवि
धर्मगुरू की बनाते है तो दूसरी ओर आश्रम के गुप्त कमरे में सैक्स
रैकेट का संचालन भी करते है। ऐसा नहीं कि सभी धर्मगुरू बदमाश हों,
लेकिन धर्मप्रमियों खासकर महिलाओं को इस बात का ध्यान रखना चाहिए
कि वे अपनी परेशानियों समाधान के लिए जिस साधु-सन्त के पास जा रहे
है, उनका स्वयं का चरित्र कैसा है। भीमानन्द जैसे बदमाश भले ही कथा
का वाचन सुन्दर तरीके कर लें, लेकिन आश्रम के अन्दर क्या हो रहा
है, इसका भी पता रहना चाहिए। भीमानन्द जैसे बदमाश इसीलिए अपने बुरे
कामों में सफल हो जाते हैं कि महिलाओं का उन्हें समर्थन मिलता है।
घर-परिवार से परेशान महिलाएं बहुत जल्दी ही किसी साधु-सन्त पर
भरोसा कर लेती हैं, लेकिन जब ऐसे साधु-सन्त भीमानन्द के रूप में
राक्षस निकलते हैं तो उन्हें पछतावा होता है।
समाज में इन दिनों गुरू बनाने की परंपरा तेजी से बढ़ी है। हर कोई
साधु-सन्त, कथावाचक, धर्मगुरू आदि इस बात पर जोर देता है कि प्रवचन
सुनने वाले सभी लोग उनके शिष्य बन जाएं, इसीलिए प्रवचनों में गुरू
का महत्व बताया जाता है। पुरानी कथाओं के संस्मरण जोड़क र
श्रद्धालुओं को प्रेरित किया जाता है कि वे उन्हें अपना गुरू मान
ले। प्रवचनों में पुराने संस्मरणों के जरिए यह दावा किया जाता है
कि गुरू बना लेने से सभी परेशानियों का समाधान हो जाएगा, जबकि
हकीकत में ऐसा होता नहीं है। अनेक कथावाचक सिर्फ अपना प्रभाव बढ़ाने
के लिए शिष्य बनाते हैं, यदि गुरू बना लेने से ही समस्याओं का
समाधान हो जाए तो भारत जैसे देश में न तो गरीबी रहेगी और न ही लोग
परेशान। यहां यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि एक कथावाचक धर्मगुरू का
पद कैसे प्राप्त कर सकता है? भारतीय संस्कृति में जो गुरू-शिष्य की
परंपरा है, वह सतयुग के काल की है। इसमें आश्रम व्यवस्था के
अन्तर्गत शिक्षा प्रदान की जाती थी और एक ही गुरू सभी प्रकार की
शिक्षा देता था। यानि शिक्षा ग्रहण करने वाले के जीवन में सिर्फ एक
ही गुरू रहता था, लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं। स्कूल-कॉजेल
और उच्च शिक्षा के दौरान बच्चों को अनेक शिक्षक मिलते हैं। चूंकि
शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है ऐसे में आश्रम व्यवस्था की
गुरू-शिष्य की परंपरा का निर्वाह नहीं हो सकता। व्यवसायीकरण के
कारण ही विद्यार्थियों के मन में शिक्षकों के प्रति सम्मान भी नहीं
रहता है। बल्कि देखा जाए तो शिक्षक और विद्यार्थी के बीच नौकर और
मालिक का रिश्ता हो गया है। विद्यार्थी तभी शिक्षा प्राप्त करता
है, जब वह मोटी राशि प्रतिमाह शिक्षा संस्थान में जमा करवाता है।
व्यवसायिक शिक्षा ग्रहण करने के पpात यदि कोई व्यक्ति किसी गुरू का
शिष्य बनता है तो वर्तमान परिस्थितियों में ऐसे सम्बंध को समझ पाना
मुश्किल है। देश में ऐसे कई साधु-सन्त और कथावाचक हैं जिनकी पहचान
इसी बात से है कि कितने धनाढय व्यक्ति उनके शिष्य हैं। जिस
धर्मगुरू, कथावाचक के जितने धनाढय शिष्य होंगे, उतना ही बड़ा
धर्मगुरू कहलाएगा। स्कूल और कालेज में पढ़ाने वाले शिक्षक की तो एक
योग्यता निधाüरित भी है, लेकिन कथित धर्मगुरू की योग्यता को कोई
मापदण्ड नहीं होता। कुछ धर्मगुरू तो ऐसे है जो सिर्फ अपने पिता की
गददी पर विराजमान हो गए हैं। यहां एक सवाल यह भी उठता है कि कोई
कथावाचक धर्मगुरू कैसे बन सकता है? कथावाचक सिर्फ हमारे पुराने
ग्रन्थों को पढ़कर श्रद्धालुओं को सुनाते हैं। देखा जाए तो यह
व्यवस्था सिर्फ एक उद्घोषक की होती है। यानि रेल्वे प्लेटफार्म पर
ट्रेनों के आने-जाने और विलब होने की सूचना जो कर्मचारी माइक से
प्रसारित करता है ठीक उसी प्रकार भारतीय ग्रन्थों में लिखी जानकारी
श्रद्धालुओं को प्रसारित की जाती है। यह हो सकता है कि धार्मिक
जानकारी प्रसारित करने वाला बुद्धिमान हो, लेकिन उसे किसी धर्मगुरू
के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं है। जहां तक धर्मगुरूओं का सवाल
है तो उस पर धर्मगुरूओं ने ही प्रश्र्नचिंह लगाा दिया है। हरिद्वार
में चल रहे महाकुंभ में अनेक धर्मगुरूओं ने कहा कि यहां फर्जी
धर्मगुरू आ गए हैं । फर्जी धर्मगुरूओं का विरोध करने वाले देश के
प्रमुख चार धर्मगुरूओं ने कहा कि शंकराचार्य शब्द का प्रयोग चार
पीठ के धर्मगुरू ही कर सकते हैं। लेकिन अफसोस है कि अनेक लोग
शंकराचार्य शब्द का प्रयोग अपने नाम के साथ कर रहे है। ऐसे माहौल
में भारत के धर्मप्रेमियों को भीमानन्द जैसे बदमाशों से सावधान
रहना चाहिए। अच्छा हो कि महिलाएं अपनी परेशानियों को घर में ही
रहकर सुलझा लें।